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Saturday, 30 January 2016

गीत

प्यार के गाँव में दंश के छाँव में,
खुबसुरत कहीं भी नजारे नही,
आसमां में जली कुछ चीताएं हैं ये,
जो चमकते हैं सारे सितारे नही,
इन सितारों से रिश्ता न तोंडूंगी मैं
दिन का साथ तुम भी नही छोड़ना,
रात से ही मुझे ब्याह रचने दो तुम,
हो सके तो नया तुम भी कुछ जोड़ना,
उम्र भर खुद का बनकर रहा सूर्य जब
चाँद ने कह दिया तुम हमारे नही,.।
प्यार की नाव ले प्राण दो सिन्धुं में,
देखते-देखते ख्वाब में खो गये,
पर जहर से भरी दंश का ज्वार देख
दोनों वापस तटो के तरफ हो गये,
टूट कर रह गये,डूब कर रह गये
दोनों पहुंचे कभी भी किनारे नही...।
चींटियाँ काटते रात दिन बाटते
मुस्कारते हुए सीधे-साधे से हम,
तुम गलत मैं सही,मैं सही तुम गलत
बंध सके बस सदा कच्चे धांगे से हम,
एक-दूजे से हम एक उमर भर लड़े
वो भी जीते नही हम भी हारे नही,...।

Wednesday, 27 January 2016

अरे रेपिस्ट मानसिकता के उद्यमियों तुम्हारे शब्दों में आज सहजता ,शिष्टता का पुट कैसे दृष्टिगोचर होने लगा,अब तक तो तुमने दुर्योधन और दू:शाशन की ही भूमिका अदा किया है।तुम्हारे शब्दों से दुपट्टे पर सिलवटे आई हैं,चाँद पर पड़ा हैं बल ,तुम्हारे होठो पर गंगा के गर्भापात की कालिख लगी है,नखो ने खुरचा हैं शीला का देह,पंजो से कुचला हैं तुमने तुलसी की निष्कलुष कोमल भावनाएं,लगाया है तेज़ाब का महावर पैरो में नही चेहरों पर। तुमने आधुनिक द्रौपदी को दूर किया है कृष्ण के कवच से।सबने तुम्हे धिक्कारा है द्रोण होने पर पर,कर्ण होने पर सबने तुमको लिखा है वहशी सबने देखा हैं तुम्हारी आखों में वक्षो का उभार, नितम्बो का निमन्त्रण। सबने तुम्हे ठहराया है दोषी ,बिना किसी गवाही बिना किसी मुकदमे के भीड़ में ,बस में,रेल में,रिक्शे में,यहाँ तक की मन्दिर में भी तुमने शिव के लिंग के बजाय पार्वती के पवित्रता पर शुचिता पर किया हैं वार। तुम जाहिल हो क्योंकि तुमने अपनी माँ के गर्भ से नही हवस के कोष से लिया है जन्म,वासना की तृप्ति से पाया है वसन,तुमने पायी है कल्पना अप्सरावो के अभिवादन से।तुम समय के इस दोपहर में अमावस हो तुमसे पूर्णिमा शुभकामना की आरज़ू नही रखती।